बिलासपुर

छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव 2023 – कांग्रेस को 2003 और बीजेपी को 2018 चुनाव का सबक ही दिखा सकता है जीत का रास्ता…..

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(शशि कोन्हेर) : बिलासपुर – छत्तीसगढ़ राज्य गठन के बाद सन् 2003 में हुए पहले विधानसभा चुनाव में तमाम परिस्थितियां अनुकूल होने के बावजूद जिन वजहों से कांग्रेस को बुरी तरह चुनाव हारना पड़ा। उनके कारणों और उससे मिले सबक, कांग्रेस को इसी साल नवंबर दिसंबर में होने वाले विधानसभा चुनाव की तैयारियों के दौरान पूरी तरह याद रखने होंगे।

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छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री बने अजीत जोगी का उस दौर में वन मैन शो चल रहा था। भाजपा के धुरंधर नेता स्वर्गीय दिलीप सिंह जूदेव की तरह स्वर्गीय अजीत जोगी को भी लोग वन मैन आर्मी कहने लगे थे। और गड़बड़ यहीं से शुरू हुई। कोई भी आर्मी ऐसी नहीं होती जिसमें केवल किसी एक व्यक्ति का रोल रहे। राजनीतिक पार्टियां तो ऐसे वन मैन शो से कभी चला ही नहीं करतीं। लिहाजा कांग्रेस में खुद को सर्वे सर्वा बना बैठे स्वर्गीय अजीत जोगी कुछ ऐसी गलतियां कर गए। जिनके परिणाम स्वरूप सन 2003 के विधानसभा चुनाव की एक तरह से जीती हुई लड़ाई, कांग्रेस को हारनी पड़ी।

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दरअसल छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद गठित हुई प्रदेश की पहली सरकार के कार्यकाल में दिग्गज नेता स्वर्गीय विद्याचरण शुक्ल की उपेक्षा से शुरू हुआ सिलसिला उनके साथ अपमानजनक बर्ताव की सीमा तक जा पहुंचा। इससे तिलमिलाए स्वर्गीय विद्याचरण शुक्ल ने शरद पवार की राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) की पतवार थामी और इसी पार्टी के बैनर तले छत्तीसगढ़ में कांग्रेस से अलग होकर 2003 का विधानसभा चुनाव लड़ने का निश्चय किया। उस दौर में स्वर्गीय अजीत जोगी की लोकप्रियता और खौफ दोनों ही चरम पर थे। भाजपा में उस वक्त ऐसा कोई नेता नहीं था जो श्री जोगी के कद की बराबरी कर पाता।

जहां तक उनके (स्वर्गीय जोगी के) खौफ की बात है…यह कहा जाने लगा था कि अजीत जोगी के “कोप” से किसी का भी बचना नामुमकिन है। उनके “कोप” से अगर से कोई शख्स बचा सकता था..तो वो स्वयं अजीत जोगी ही थे। दूसरा कोई नहीं। शायद इसी माहौल का असर था कि श्री जोगी ने स्वर्गीय विद्याचरण शुक्ल को हल्के में आंका और सन 2003 के विधानसभा चुनाव में यही बात कांग्रेस की हार का सबसे प्रमुख कारण साबित हुआ।

इस चुनाव में भाजपा को 39.26 प्रतिशत मतों के साथ 50 सीटें मिली, जबकि कांग्रेस की चुनावी गाड़ी उससे कम 36.71 मत प्रतिशत के साथ केवल 37 ही सीटों पर जाकर अटक गई। यह ठीक है कि उस समय विद्याचरण शुक्ल की अगुवाई में चुनाव लड़ने वाली एनसीपी को छत्तीसगढ़ में मात्र 7.02 प्रतिशत मत और केवल एक (नोबेल वर्मा चंद्रपुर) सीट ही मिली धी। लेकिन यही 7.02% मत कांग्रेस की घोर पराजय का कारण बने और उसे छत्तीसगढ़ की सत्ता से हाथ धोना पड़ा।


इन चुनाव के तुरंत बाद राज्यसभा सदस्य श्री रामाधार कश्यप के साथ कांग्रेस की वरिष्ठ नेत्री मोहसिना किदवई राज्यसभा सदस्य से दिल्ली में मिलने का मौका लगा। इस दौरान हुई बातचीत में कांग्रेस नेत्री मोहसिना किदवई बातों बातों में बार-बार यह अफसोस जाहिर करती रहीं कि अगर जोगी जी ने विद्याचरण शुक्ल के साथ सामंजस्य बिठा लिया होता तो छत्तीसगढ़ में सन् 2003 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की नैया नहीं डूबती।


खैर, कांग्रेस की इस पराजय के साथ ही छत्तीसगढ़ में डॉ रमन सिंह का उदय हुआ जो चाउर वाले बाबा की अपनी छवि के साथ लगातार 15 साल तक मुख्यमंत्री के पद पर बने रहे। अपने शुरुआती दौर में विरोधियों के बीच भी जेंटलमैन कहलाने वाले डॉ रमन सिंह दूसरे और तीसरे कार्यकाल में अफसरशाही के चक्रव्यूह में घिरते चले गए। हालत यह हो गई कि भाजपा के स्टार प्रचारक स्वर्गीय दिलीप सिंह जूदेव को भी भाजपा के ही शासनकाल के लिए बोलना पड़ा कि छत्तीसगढ़ में प्रशासनिक आतंकवाद चल रहा है। यह शब्द छत्तीसगढ़ की राजनीतिक डिक्शनरी में शायद नया जरूर हो लेकिन 2003 के विधानसभा चुनाव में स्वर्गीय अजीत जोगी की अगुवाई वाली कांग्रेस के परास्त होने में इसी प्रशासनिक आतंकवाद के खिलाफ प्रदेश भर में चल रहे अंडरकरेंट का बहुत बड़ा रोल था। आमतौर पर मुख्यमंत्री बनने वाले नेता यह दावा करते हैं कि उनके पास नौकरशाही के घोड़े पर सवारी करने के साथ ही उसे काबू में रखने का हुनर और माद्दा दोनों है। लेकिन बाद में यही नौकरशाही का यही घोड़ा, कब उन नेताओं पर ही सवार होकर प्रशासनिक आतंकवाद का चाबुक चलाना शुरु कर देती है यह किसी को पता भी नहीं चल पाता। अपने पहले कार्यकाल में जेंटलमैन कहलाने वाले डॉक्टर रमन सिंह दूसरे कार्यकाल के पहले सस्ते चावल की योजना बनाकर चाउर वाले बाबा बने और पार्टी को दूसरा विधानसभा चुनाव जीता ले गए। किसी दूसरे सन 2008 के विधानसभा चुनाव मैं पूर्व मुख्यमंत्री स्वर्गीय अजीत जोगी के साथ उनकी नई नई मितानी बदने की चर्चा शुरू हुई। जिसके कारण तीसरे चुनाव के आते आते चाउर वाले बाबा को यह (खुशफहमी हो गई) लगने लगा कि जब तक अजीत जोगी छत्तीसगढ़ में सक्रिय हैं तब तक उन्हें या भाजपा को विधानसभा चुनाव में कांग्रेस नहीं हरा सकती। और उनके इसी सोच और अफसरशाही पर निर्भरता कोख से पैदा हुए प्रशासनिक आतंकवाद और मनमानी के चलते खुद भाजपा कार्यकर्ताओं की उपेक्षा तथा कहीं-कहीं अपमान का अंतहीन सिलसिला शुरू हुआ। जिसके कारण सन् 2018 के चुनाव में भाजपा कार्यकर्ता या तो अपने घर बैठ गए या अपनी ही पार्टी के प्रत्याशियों को पराजय का अभिशाप दे दिया। फिर इस चुनाव में पूर्व मुख्यमंत्री स्वर्गीय अजीत जोगी की पंदौली भी तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ रमन सिंह और भाजपा के काम नहीं आई। हमें लगता है कि भाजपा के नेताओं को यह सब याद ही होगा। और इसलिए भाजपा को 2023 का विधानसभा चुनाव लड़ने के की तैयारी करते समय 2018 के विधानसभा चुनाव में मिले सबक और चुनाव हारने की वजहों को नहीं भूलना चाहिए।

वहीं कांग्रेस को भी सन 2003 और सन 2008 तथा सन 2013 के विधानसभा चुनावों में पार्टी की हार के कारणों और उनसे मिले सबक का हर पल स्मरण करना चाहिए। दरअसल होता यह है कि दुख में तो हम सभी सबक याद रखने की कोशिश करते हैं। लेकिन सुख में आते ही हम वो सभी सबक भूल जाते हैं जो हमें अच्छे से याद थे। उम्मीद करनी चाहिए कि आने वाले चुनाव में कांग्रेस कांग्रेसी भारतीय जनता पार्टी की चुनावी रणनीति तथा जय पराजय की तैयारी करने वाले नेता छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद अब तक यहां हुए 4 विधानसभा चुनाव से मिले सबक ना केवल अच्छे से याद रखेंगे वररन उनका ध्यान भी रखेंगे। अन्यथा समय का चक्र बहुत निर्दयी और बेरहम होता है ।।

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