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सपने में आए श्रीराम तो नोएडा से अयोध्या को दौड़ पड़ीं कोमल, 23 को पहुंचेंगी रामनगरी

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(शशि कोन्हेर).: सपने में आए श्रीराम तो नोएडा से 700 किमी दूर अयोध्या के लिए कोमल दौड़ पड़ीं। 12 जुलाई को निकलीं कोमल 23 जुलाई को अयोध्या पहुंचेंगी। गाजियाबाद की कोमल तलवार (21) फिजिकल एजुकेशन की छात्रा हैं। राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिता में कई पदक भी जीत चुकी हैं।

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गुरुवार को कानपुर पहुंचीं कोमल का राष्ट्रीय शर्करा संस्थान (एनएसआई) में भव्य स्वागत हुआ।  संस्थान के निदेशक प्रो. नरेंद्र मोहन, वैज्ञानिकों की टीम और छात्र-छात्राओं ने कोमल के हौसले को सलाम किया। प्रो. मोहन ने कहा कि कोमल संस्थान की ब्रांड एम्बेसडर बनने जा रही हैं।

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वहीं, कोमल ने बताया कि एक दिन सपने में प्रभु श्रीराम आए। सुबह नींद खुली तो मैंने ठान लिया कि अयोध्या जाना है। परिवार और कोच से बात की। करीब 700 किमी दौड़ पूरी कर कोमल इंडिया बुक ऑफ रिकॉर्ड और लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड में अपना नाम दर्ज कराएंगी। कोमल ने बताया कि अगला लक्ष्य 5000 किमी दूर लंका जाने का है, जहां प्रभु श्रीराम माता सीता को रावण की कैद से छुड़ाने गए थे।

सफाई कर्मचारी की बेटी हैं कोमल

गाजियाबाद के भोपूपुरा निवासी कोमल के पिता विनोद कुमार ईस्ट दिल्ली म्युनिसिपल कॉरपोरेशन में सफाई कर्मचारी हैं। मां हेमलता गृहिणी हैं। बड़ी बहन शिवानी, अंजलि फिर कोमल तीसरे नंबर पर है। इसके बाद एक छोटा भाई मयंक और सबसे छोटी बहन खुशी है। कोमल एमएमएनएस कॉलेज में स्नातक द्वितीय वर्ष की छात्रा है।

दो साल पहले ठाना, बनना है एथलीट

कोमल ने बताया कि 2021 में इंटर कर रही थी। स्कूल में बच्चों को एथलीट खेलता देखा तो मन में आया कि मैं भी तैयारी करूं। कोच राजेंद्र यादव के निर्देशन में खेलना शुरू किया। गाजियाबाद में हुई यूनिवर्सिटी गेम प्रतियोगिता में कोमल ने 5000 मीटर दौड़ में कांस्य जीता। 2022 में फरीदाबाद में हुई मैराथन में 21 किमी दौड़ लगाकर स्वर्ण जीता। 2022 में गुड़गांव में टफमैन मैराथन में 21 किमी दौड़ में स्वर्ण जीता।

इस रूट से अयोध्या पहुंचेंगी कोमल

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12 जुलाई को कोमल ने नोएडा से दौड़ शुरू की। वहां से वृंदावन, मथुरा, आगरा, इटावा होते हुए गुरुवार को कानपुर पहुंची हैं। यहां से लखनऊ, सीतापुर होते हुए 23 जुलाई को अयोध्या पहुंचेंगी। फिर रामलला के दर्शन करने के बाद वापस लौटेंगी।

ग्राउंड जाने के भी नहीं होते थे पैसे

कोमल ने बताया कि ग्राउंड जाने के लिए भी पैसे नहीं होते थे। घर से हमारा ग्राउंड करीब 28 किमी दूर है। कुछ दिन तो आना-जाना कर पाई पर इसके बाद स्कूटी में पेट्रोल का खर्च बढ़ने लगा। इससे ट्रेनिंग लेना बंद कर दिया। फिर कोच ने एक समाधान खोजा। उन्होंने बड़ी बहन अंजलि को मैदान पर असिस्टेंट ट्रेनर रख लिया, जिससे दोनों बहनें साथ ग्राउंड जाने लगीं।

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