बिलासपुर

कलाकारों की कल्पना की उड़ान रतनपुर की मूर्ति कला…..

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(विजय दानिकर) : बिलासपुर – छत्तीसगढ़ की प्राचीन राजधानी रतनपुर जो हर क्षेत्र में समृद्ध रहा है, जिसमें रतनपुर कला के क्षेत्र में आज भी अग्रणी स्थान माना जाता है जिसने मूर्तिकला, कांस्यकला और हस्तकला का से कला यहां के बेमिसाल उदाहरण माने जाते हैं, जो कभी रतनपुर की शान रहा होगा, किंतु समय के बदलते करवट ने आज उनके कुछ निशानी देखने को मिलती है तथा कुछ विलुप्त होने कब कगार पर है।

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“मूर्तिकला”- रतनपुर की विभिन्न स्थलों की मोटी दीवारों पर उत्कीर्ण मूर्तियां जिनमें देवी-देवताओं और नायक नायिकाओं की अड्यूटीय मूर्तियां कारीगरों की कलात्मकता से भरी पड़ी है, जिनमें नगर के पुराना बस स्टैंड स्थित प्राचीन गज किला के प्रवेश द्वार के दीवारों पर अप्सराओं की भाव भंगिमा मुद्रा में अत्यंत ही मनमोहक प्रतिमा देखने को मिलती है, जिनमें इनका अधोवस्त्र,केश विन्यास तथा गहनों में कुंडल,सांटी,बाजूबंद आदि के सिंगार से परिपूर्ण नजर आ रहे हैं ,इसके अलावा इन्हीं दीवारों पर लंकापति रावण की दुर्लभ प्रतिमा भी उत्कीर्ण है, जिसका कुछ भाग अब भग्नावशेष हो चुका है, इस मूर्ति को ध्यान से देखने पर ऐसा प्रतीत होता है जिसमें दशानन अपने सिर को काट-काट कर मानो शिवजी को अर्पित कर रहे हो निश्चित ही इन्हें बनाने वाले कलाकारों ने अपनी कल्पना की उड़ानों से इन सभी मूर्तियों में जान फूंक दिया हो ऐसा महसूस होता है।

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“कांस्यकला”- किवदंतियों पर यदि गौर किया जाए तो लोगों का यह मानना है कि किसी जमाने में रतनपुर इतना समृद्ध रहा होगा कि यहां हफ्ते में 52 बाजार लगा करता था, जहाँ हीरे,मोतियों से लेकर यहां कांसे का बना हुआ बर्तन प्रसिद्ध रहा है, जिसे बनाने वाले कारीगरों को कसेर कहा जाता है, जिनके नाम से एक पूरा मोहल्ला आज भी यहां बसा हुआ है, जिसे कसेरपारा के नाम से जाना जाता है , किंतु समय के बदलते परिवेश ने अब यहां के प्रसिद्ध कांसे के बर्तन का स्थान अब स्टील व अन्य धातुओं ने ले लिया है यहां के कांसे के बर्तनों में इन कारीगरों द्वारा बनाया हुआ लोटा,थाली,बटुवा,गिलास आदि बर्तन यहां के कांस्यकला के इतिहास को बयां करता है, जिसमें रतनपुरिहा कंसहा लौटा प्रसिद्ध था, जिसे अक्सर शादी ब्याह में दहेज के रूप में देने के लिए लोग अवश्य ले जाते थे, किंतु आज यहां पर कुछ गिने-चुने इक्का-दुक्का ही इन कसेर कारीगरों के द्वारा इस पुश्तैनी कारोबार में कांसे व पीतल के बर्तनों को सिर्फ चमकाने का ही कार्य किया जाता है,यहां की एक गौरवशाली परंपरा अब विलुप्त होते जा रही है।

“मिट्टी के बर्तन”- एक समय में कांस्य कला की तरह ही रतनपुर में बनी मिट्टी के बर्तनों की भारी मांग रही है, जहां समय-समय में खुदाई के दौरान आज भी यहां प्राचीन मिट्टी के बर्तन मिलने के प्रमाण मिलते रहते हैं। बताया जाता है कि राजा कल्याण साय के द्वारा किले में जगन्नाथ मंदिर का निर्माण करवाया गया तो उसी दौरान उड़ीसा के शिल्पकारों के साथ कुंभकार जाति के लोग भी यहां आ गए थे जो यहां पर बस गए जहां इनका भी एक पूरा मोहल्ला आज भी कुम्हारपारा के नाम से जाना जाता है, जिनके द्वारा पानी का घड़ा, दोहनी, परई, कुड़ेरा तथा पर्व विशेष में ज्योति कलश,दिया व मुख्य रूप से तीजा पोरा आदि त्यौहारों में यहां मिट्टी के खिलौनों में नंदिया बैला व पोरहा को आज भी प्रसिद्धि मिली हुई है किंतु आज के इस आधुनिकीकरण दौर में मिट्टी के बर्तनों की मांग अब धीरे-धीरे कम होती चली जा रही है।

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