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दुनिया में आप-हम-सब कठपुतलियां ही तो हैं… कोई किसी के, तो कोई किसी के और सारे के सारे “एक उनके”इशारे पर… नाच..ठुमक..रहे हैं..!

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(शशि कोन्हेर) : बिलासपुर – विश्व कठपुतली दिवस पर आज हममें से बहुतों ने कठपुतलियों की कला का अवलोकन कर कलाकारों पर मानो किया एहसान सा किया हो। मगर सच्चाई यह है कि कठपुतलियां निर्जीव होने के बाद भी हमें जो संदेश दिया करती हैं…उसे सजीव और विवेकवान होने के बाद भी हम या तो समझते नहीं..या समझ कर भी नजरअंदाज किया करते हैं। कठपुतलियां चाहे काष्ठ की हो, या फिर कपड़े अथवा अन्य किसी चीज की। वे अपनी अदाओं और नाच गानों, ठुमकों तथा कहानियों के बीच हम सबको चुपके से एक संदेश दे जाती हैं कि केवल हम ही कठपुतली नहीं हैं।

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हमारी तरह इस संसार में न जाने कितनी कठपुतलियां मौजूद हैं। आप सब भी चाहे कितने बड़े या छोटे हो इस संसार में कठपुतली की तरह ही हो। और हमारी ही आपकी डोर भी किसी दूसरे के ही हाथ में है। और जिसके इशारे पर आपको ठुमकना नाचना दौड़भाग करना पड़ रहा है। हर कोई कठपुतलियों की तरह ही जाने वाले के हाथों नाचने पर विवश है। कोई किसी की उंगलियों के इशारों पर नाच रहा है। तो कोई किसी और के इशारों पर दौड़ भाग कर रहा है। कोई किसी का मोहरा बनकर तलवार चला रहा है। तो कोई शांति दूत बनकर अमन चैन का संदेश दे रहा है। लेकिन है तो सब कठपुतलियां हीं…किसी को भी इस बात का गुमान नहीं होना चाहिए कि वह जो भी कर रहा है वह अपने बूते पर कर रहा है। और स्वयं कर रहा है। अखिल विश्व में कोई भी, कुछ भी अपने मन से नहीं कर पाता। ऐसा होता तो इंसान जो कुछ भी चाहता है। उसे हासिल कर लेता। लेकिन यहां तो हवा और हवा से हिलने वाले पत्ते भी किसी के इशारे के गुलाम हैं।

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यहां तक कि आज कठपुतली दिवस पर कठपुतलियों को नाच नचाने वाले कलाकार भी किसी की कठपुतली ही हैं। उन्हें भी कोई अपनी उंगलियों पर नचा रहा होता है। कठपुतलियां नचाने वाले कलाकार तो आपको यहां वहां मिल जाएंगे। लेकिन जो सबको कठपुतलियों की तरह मचा रहा है… या हम सब जिनकी कठपुतलियां है और जिनके इशारों पर नाच रहे हैं। हमारी डोर जन्म से मृत्यु तक जिनके हाथों में रहती है। हमें हमेशा उनके इशारों पर ही चलना फिरना नाचना या ठुमकना है। यह अलग बात है कि हम चाह कर भी कुछ और कर भी नहीं सकते। हम सभी को उसी परमपिता परमात्मा का श्रद्धा पूर्वक पुण्य स्मरण करना चाहिए जिसके हाथों में हमारी डोर है। और जो कभी भी हमें मंच पर उतारकर नचा सकते है। रुला सकते है। योद्धा बना सकते हैं। राजा और रंक की भूमिका दे सकते हैं। अथवा मंच से उठा सकते है। आज कठपुतली दिवस पर तमाम कठपुतलियां यही संदेश दे रही है कि हम कुछ भी नहीं है। जिनके हाथों में हमारी दूर है असल मालिक वही है। और हमारा हाल तो बहुत कुछ उस खिलौने जैसा है जिसके बारे में कहा जाता है… जितनी चाबी भरी राम ने उतना चले खिलौना..!

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