छत्तीसगढ़

“उत्तम आकिंचन्य” धर्म के रूप में मनाया गया दक्षिण महापर्व का नवमां दिन

Advertisement

(शशि कोन्हेर) : बिलासपुर । आत्म कल्याण के इस महापर्व में प्रतिदिन बिलासपुर स्थित तीनों जैन मंदिर जी में प्रातः अभिषेक पूजन के साथ, श्री श्रमण संस्कृति संस्थान सांगानेर से पधारे आशीष शास्त्री के प्रवचन प्रातः सरकण्डा मंदिर जी में हो रहे। दोपहर में क्रांतिनगर मंदिर जी में स्वाध्याय करवाया जा रहा।

Advertisement

सांध्यकालीन कार्यक्रम में क्रांतिनगर मंदिर जी में सामायिक, तत्पश्चात तीनों मंदिर में संगीतमय आरती, रात्रि में क्रांतिनगर जैन मंदिर के नायक हाल में धार्मिक/सांस्कृतिक कार्यक्रम संपन्न हो रहे। समाज में इस महापर्व में प्रत्येक घरों में छोटी बड़ी तपस्या छोटे बच्चों से बड़े बुजुर्ग तक किए जा रहे हैं।

Advertisement


पंडित जी ने अपने प्रवचन में इस धर्म के बारे में विवरण बताते हुए कहा कि आत्मा के अपने गुणों के सिवाय जगत में अपनी अन्य कोई भी वस्तु नहीं है इस दृष्टि से आत्मा अकिंचन है। अकिंचन रूप आत्मा-परिणति को आकिंचन करते हैं। जीव संसार में मोहवश जगत के सब जड़ चेतन पदार्थों को अपनाता है, किसी के पिता, माता, भाई, बहिन, पुत्र, पति, पत्नी, मित्र आदि के विविध सम्बंध जोड़कर ममता करता है। मकान, दूकान, सोना, चाँदी, गाय, भैंस, घोड़ा, वस्त्र, बर्तन आदि वस्तुओं से प्रेम जोड़ता है।

शरीर को तो अपनी वस्तु समझता ही है। इसी मोह ममता के कारण यदि अन्य कोई व्यक्ति इस मोही आत्मा की प्रिय वस्तु की सहायता करता है तो उसको अच्छा समझता है, उसे अपना हित मानता है। और जो इसकी प्रिय वस्तुओं को लेशमात्र भी हानि पहुँचाता है उसको अपना शत्रु समझकर उससे द्वेष करता है, लड़ता है।

झगड़ता है इस तरह संसार का सारा झगड़ा संसार के अन्य पदार्थों को अपना मानने के कारण चल रहा है। अन्य पदार्थों की इसी ममता को परिग्रह कहते हैं। यदि भरत चक्रवर्ती के समान सुंदर लुभावने पदार्थों के रहते हुए भी उन पदार्थों से मोह ममता न हो, उनको अपना समझे जल में कमल की तरह से अपने आपको सबसे पृथक् समझे।

यानी-संसार उनके चारों ओर हो तो हो, किन्तु उसके हृदय में अपनी आत्मा के सिवाय संसार की कोई जड़ चेतन वस्तु न हो, तो न उसके अन्तरंग में परिग्रह है न बहिरंग में कोई परिग्रह है तथा यदि मन में पदार्थों के साथ मोह ममता है किन्तु नग्न दिगम्बर साधु तो वह परिग्रही है। उस साधु की अपेक्षा भरत सरीखा गृहस्थ श्रेष्ठ है। इसी भाव को श्री समन्तभद्राचार्य ने रत्नकरण्ड श्रावकाचार में यूं प्रकट किया है –
गृहस्थो मोक्षमार्गस्थो निर्मोही नैव मोहवान्।
अनगारो गृही श्रेयात् निर्मोही मोहिनो मुनेः।।
अर्थात्- मोह ममता रहित गृहस्थ मोक्षमर्गा पर

सांस्कृतिक एवं धार्मिक कार्यक्रम की कड़ी में नैवेद्यम समूह द्वारा मुनि प्रमाण सागर द्वारा रचित मंगल भावना पर अत्यंत मनोहारी प्रस्तुति दी गई। इसके पश्चात पूरे समूह ने भगवान महावीर की भक्ति प्रस्तुत की। प्रस्तुति करने वालों में पूनम दोशी, स्वाति, शैफाली, अनि, रितिका, प्रतिमा, अतिका, प्रिया, दीपिका, बिंदु, आरू, अर्जुन, सम्यक, रिदम, खुशी, अनायरा, सारा शामिल थे।
इस अवसर पर श्रीमंत सेठ प्रवीण जैन, समाज के अध्यक्ष दीपक जैन, शैलेश जैन, डॉ. अरिहंत जैन, कैलाश जैन, अरुण जैन, दिनेश संध्या जैन, अरविन्द जैन, अमित जैन, अंशुल जैन, गौरव जैन, रमेश जैन, सोमेश जैन, प्रभाष जैन, अरविन्द जैन, शरद जैन पंकज पंचायती, बाहुबली जैन, कैलाश जैन, भूपेन्द्र चंदेरिया, सुप्रीत जैन, रजनीश जैन सहित बड़ी संख्या में समाज के सदस्य उपस्थित थे।

Advertisement

Advertisement

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button