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श्रीलंका जाने वाली है चीन की ‘रहस्यमयी रिसर्च शिप’, भारत से लेकर अमेरिका तक अलर्ट

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(शशि कोन्हेर) : चीन की एक रिसर्च शिप अगले महीने श्रीलंका की यात्रा पर जाने वाली है। इसे लेकर अमेरिका की चिंता बढ़ गई और उसने दोनों देशों तक यह बात पहुंचा दी है। रिपोर्ट के मुताबिक, इस रहस्यमयी पोत का दौरा भारत के लिए भी चिंता का सबब हो सकता है।

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भारत इससे पहले चीन के जासूसी पोत के श्रीलंका में ठहरने पर सुरक्षा संबंधी मुद्दे को उठा चुका है। चीनी स्टेट ब्रॉडकास्टर CGTN की ओर से बताया गया कि शी यान 6 ‘वैज्ञानिक अनुसंधान पोत’ है। इसके क्रू मेंबर्स की संख्या 60 है। यह शिप समुद्र विज्ञान, समुद्री भूविज्ञान और समुद्री पारिस्थितिकी के अध्ययन के लिए बनाई गई है।

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डेली मिरर अखबार की खबर के अनुसार, संयुक्त राष्ट्र महासभा सत्र के इतर न्यूयॉर्क में श्रीलंकाई विदेश मंत्री अली साबरी से अमेरिकी उप विदेश मंत्री विक्टोरिया नूलैंड ने मुलाकात की। इस दौरान उन्होंने चीनी रिसर्च शिप ‘शी यान 6’ की आगामी यात्रा के बारे में चिंता जताई।

इस पर मंत्री साबरी ने उन्हें बताया कि श्रीलंका एक तटस्थ देश है। उन्होंने कहा, ‘श्रीलंका ने अपने क्षेत्र में किसी भी गतिविधि को अंजाम देने में विदेशी जहाजों और विमानों की ओर से अपनाई जाने वाली मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) पर काम किया है।’

श्रीलंका ने बताई चीन को इजाजत देने की वजह
श्रीलंकाई विदेश मंत्री ने अपने अमेरिकी समकक्ष को बताया कि श्रीलंका ने सभी देशों के लिए इस दृष्टिकोण को समान रखा है। उन्होंने कहा कि यही वजह है जिससे चीन को इस प्रक्रिया से बाहर नहीं किया जा सकता है। इससे पहले राष्ट्रपति रानिल विक्रमसिंघे ने भी कहा था कि विदेशी जहाजों के लिए एसओपी पर काम किया गया है।

श्रीलंका के विदेश मंत्रालय ने पिछले महीने कहा था कि वह फिलहाल चीन की रिसर्च शिप को देश में ठहरने की इजाजत देने के उसकी अपील पर विचार कर रहा है। मालूम हो कि चीनी शोध पोत के अक्टूबर में श्रीलंका में राष्ट्रीय जलीय संसाधन अनुसंधान और विकास एजेंसी (NARA) के साथ रिसर्च करने की उम्मीद है।

श्रीलंका में लगातार अपने शिप भेज रहा चीन
चीन नियमित आधार पर अपनी रिसर्च/निगरानी जहाज श्रीलंका भेजता रहा है। इस साल अगस्त में चीनी पीएलए नेवी का युद्धपोत हाइ यांग 24 एचएओ दो दिवसीय दौरे पर देश में आया था। इस दौरान भारत की चिंताओं के कारण इसके यहां पहुंचने में देरी भी हुई थी।

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पिछले साल अगस्त में चीनी बैलिस्टिक मिसाइल और उपग्रह निगरानी जहाज ‘युआन वांग 5’ इसी तरह की यात्रा पर दक्षिणी श्रीलंका के हंबनटोटा बंदरगाह पर पहुंचा था। इसे लेकर भारत ने कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त की थी। नई दिल्ली को डर था कि श्रीलंकाई बंदरगाह के रास्ते में जहाज का सर्विलांस सिस्टम भारतीय रक्षा प्रतिष्ठानों पर जासूसी करने का प्रयास कर सकता है।

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‘द्वितीय विश्व युद्ध के बाद सबसे बड़े सैन्य निर्माण में जुटा चीन’
दूसरी ओर, ऑस्ट्रेलिया ने दावा किया कि चीन द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से पारंपरिक रूप से अपनी सैन्य क्षमता और ताकत को बढ़ाने की दिशा में काम कर रहा है। भारत में ऑस्ट्रेलिया के उच्चायुक्त फिलिप ग्रीन ने कहा, ‘चीन द्वितीय विश्व युद्ध के बाद दुनिया में सबसे बड़े पैमाने पर पारंपरिक रूप से अपनी सैन्य क्षमता को बढ़ाने के कार्य में जुटा हुआ है। चीन ने इसके लिए अपने रणनीतिक उद्देश्यों या आश्वस्त करने वाले राजकीय कारणों को स्पष्ट नहीं किया है।

उन्होंने कहा कि ऑस्ट्रेलिया ने एक मुश्किल दौर के बाद चीन के साथ अपने संबंधों को स्थिर करने की कोशिश की है। दरअसल, चीन का अपने लगभग सभी पड़ोसियों के साथ समुद्री और जमीनी सीमाओं पर विवाद है। इसमें दक्षिण चीन सागर भी शामिल है, जो ऑस्ट्रेलिया के लिए विशेष रुचि का क्षेत्र है।

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