परिंदों के मसीहा: बिलासपुर के युवा चंचल सलूजा की करुणा भरी पहल ने जीते दिल

बिलासपुर – “जब कोई मौन प्राणी हमारी तरफ उम्मीद से देखे, और हम उसकी प्यास बुझा सकें — वही असली इंसानियत होती है।”
बिलासपुर के युवा समाजसेवी चंचल सलूजा ने इसी सोच को ज़मीन पर उतारा है… एक ऐसी पहल जो न प्रचार मांगती है, न पुरस्कार… बस चाहती है इंसानों में करुणा।
गर्मी की तपती दोपहर में जब लोग घरों में दुबके होते हैं, तब चंचल सलूजा अपने शहर के पंखों वाले मेहमानों के लिए पानी लेकर निकलते हैं। छत्तीसगढ़ के बिलासपुर शहर में रहने वाले इस युवा ने अपनी संवेदनशील सोच से एक नई परंपरा शुरू की है — परिंदों के लिए प्याऊ अभियान।
कोरोना काल के दौरान शुरू हुई यह मुहिम आज सैकड़ों पक्षियों की प्यास बुझा रही है।
चंचल खुद मिट्टी के बर्तन खरीदते हैं, साफ रखते हैं और दिन में दो बार ताज़ा पानी भरते हैं।
उनकी यह सेवा न किसी संस्था की है, न किसी फंडिंग की — यह सिर्फ दिल से निकला एक जज़्बा है।
चंचल की यह करुणामयी पहल अब एक आंदोलन बनती जा रही है। बच्चे, परिवार, कॉलोनी — सभी उनके इस प्रयास से प्रेरणा ले रहे हैं। अब वह स्कूलों में जाकर बच्चों को पर्यावरण, जल संरक्षण और पक्षी बचाने की शिक्षा देना चाहते हैं। सम्मान की उम्मीद नहीं, सहयोग की कामना करने वाले चंचल सलूजा जैसे युवा आज की ज़रूरत हैं। क्योंकि इंसानियत केवल भाषणों में नहीं, उन प्यालियों में होती है — जो किसी मासूम की जान बचा सकती हैं।




