कुर्सी का मोह या कमीशन का खेल? जिला अस्पताल से प्राइवेट रेफरल का आरोप, सिस्टम पर सवाल

(जयेन्द्र गोले) : बिलासपुर। जिला अस्पताल की व्यवस्था पर उठते सवाल अब महज लापरवाही तक सीमित नहीं रह गए हैं, बल्कि पूरे सिस्टम की नीयत पर उंगली उठाने लगे हैं। रिटायरमेंट के बाद भी एक डॉक्टर का प्रभाव बनाए रखना और उसी के भरोसे अस्पताल चलाना इस बात की ओर इशारा करता है कि कहीं न कहीं यह सब सुनियोजित तरीके से हो रहा है। सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या प्रशासन को पहले से मेडिसिन विशेषज्ञ की कमी का अंदेशा नहीं था, या फिर जानबूझकर हालात ऐसे बनाए गए?
सरकारी अस्पताल, जहां मरीजों को मुफ्त और बेहतर इलाज मिलना चाहिए, वहां से उन्हें निजी अस्पतालों मे भेजने के आरोप बेहद गंभीर हैं। कहा जा रहा है कि जिन मरीजों का इलाज जिला चिकित्सालय में संभव है, उन्हें भी मेडिसिन डॉक्टर द्वारा बाहर रेफर किया जा रहा है। अगर इसमें कमीशन या निजी लाभ की मंशा शामिल है, तो यह न सिर्फ अनैतिक है बल्कि गरीब मरीजों के अधिकारों का खुला हनन भी है।
सूत्रों के अनुसार, यह पहला मामला नहीं है जब संबंधित डॉक्टर पर निजी अस्पतालों से जुड़ाव के आरोप लगे हैं। इससे पहले भी पद पर रहते हुए निजी अस्पतालों में सेवा देने की शिकायतें सामने आई थीं। इतना ही नहीं, सिविल सर्जन जैसे महत्वपूर्ण पद पर रहते हुए भी निजी प्रैक्टिस जारी रखने और साथ ही शासन से नॉन-प्रैक्टिस अलाउंस लेने जैसे गंभीर आरोप चर्चा में रहे हैं। बाद में नॉन-प्रैक्टिस अलाउंस छोड़ना भी इस पूरे मामले को और प्रमाणित करता है।
प्रशासन की चुप्पी और कार्रवाई का अभाव इस पूरे घटनाक्रम को और गहरा बना रहा है। बिना वैधानिक प्रक्रिया, बिना पारदर्शिता और जवाबदेही तय किये बिना अस्पताल चलाना सीधे-सीधे जनता के भरोसे के साथ खिलवाड़ है। अब जरूरत है निष्पक्ष जांच और सख्त कार्रवाई की, ताकि यह साफ हो सके कि यह महज अव्यवस्था है या फिर एक सुनियोजित खेल—जिसकी कीमत गरीब मरीज अपनी जेब और जिंदगी दोनों से चुका रहा है।



