खामोश हुई पंडवानी की अमर आवाज़, पद्म विभूषण डॉ. तीजन बाई का निधन

(भूपेंद्र सिंह राठौर ) : छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति की पहचान, पंडवानी गायन की विश्वविख्यात स्वर साधिका और पद्म विभूषण से सम्मानित डॉ. तीजन बाई अब हमारे बीच नहीं रहीं। रविवार तड़के रायपुर एम्स में उन्होंने अंतिम सांस ली। वे 70 वर्ष की थीं और पिछले कुछ समय से अस्वस्थ चल रही थीं। उनके निधन से छत्तीसगढ़ सहित पूरे देश में शोक की लहर है। लोककला जगत ने आज अपनी सबसे बुलंद आवाज़ खो दी है, जिसने अपनी कला के दम पर छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक विरासत को देश ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया तक पहुंचाया।
8 अगस्त 1956 को छत्तीसगढ़ में जन्मीं डॉ. तीजन बाई का बचपन बेहद साधारण परिस्थितियों में बीता। कम उम्र में ही उन्होंने पंडवानी गायन सीखना शुरू कर दिया। उस दौर में पंडवानी मुख्य रूप से पुरुष कलाकारों की विधा मानी जाती थी, लेकिन उन्होंने तमाम सामाजिक चुनौतियों का सामना करते हुए इस परंपरा को नई दिशा दी। महाभारत की कथाओं को अपनी बुलंद आवाज़, सशक्त अभिनय, संवाद शैली और एकतारे की अनूठी प्रस्तुति के साथ उन्होंने इस तरह जीवंत किया कि दर्शक मंत्रमुग्ध हो जाते थे।
डॉ. तीजन बाई ने पंडवानी को गांव-गांव की चौपालों से निकालकर देश और दुनिया के प्रतिष्ठित मंचों तक पहुंचाया। यूरोप, अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, जापान, ऑस्ट्रेलिया समेत अनेक देशों में उन्होंने अपनी प्रस्तुतियों से भारतीय लोक संस्कृति का परचम लहराया। उन्होंने सिर्फ पंडवानी का गायन नहीं किया, बल्कि छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति, लोकभाषा, लोक परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत को देश-विदेश में जीवंत रखा और विश्व पटल पर उसकी अलग पहचान स्थापित की। उनकी प्रस्तुति ने दुनिया को यह एहसास कराया कि भारत की लोक कलाएं भी किसी शास्त्रीय कला से कम समृद्ध नहीं हैं।
भारतीय लोककला में उनके अद्वितीय योगदान को देखते हुए भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री, पद्म भूषण और देश के दूसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म विभूषण से सम्मानित किया। इसके अलावा उन्हें संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार सहित अनेक राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सम्मानों से नवाजा गया। उन्होंने अपना पूरा जीवन लोक परंपराओं के संरक्षण, नई पीढ़ी को पंडवानी सिखाने और छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पहचान को मजबूत करने में समर्पित कर दिया।
डॉ. तीजन बाई के निधन पर मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने गहरा शोक व्यक्त करते हुए कहा कि उनका निधन न केवल लोककला जगत बल्कि पूरे देश की सांस्कृतिक विरासत के लिए अपूरणीय क्षति है। वहीं पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने उन्हें छत्तीसगढ़ की अनमोल धरोहर बताते हुए कहा कि उन्होंने अपने गायन से पंडवानी को जीवंत रखा और छत्तीसगढ़ का नाम पूरी दुनिया में गौरवान्वित किया। कला, साहित्य, संस्कृति और राजनीति से जुड़े अनेक लोगों ने भी उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की।
डॉ. तीजन बाई का जाना एक युग का अंत है। उन्होंने अपनी आवाज़ से महाभारत को जीवंत किया, पंडवानी को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया और छत्तीसगढ़ की संस्कृति को विश्व मंच पर सम्मान दिलाया। उनकी कला, उनका संघर्ष और उनकी विरासत आने वाली पीढ़ियों को हमेशा प्रेरित करती रहेगी। पंडवानी की यह अमर स्वर साधिका भले ही आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी आवाज़ और उनकी सांस्कृतिक विरासत सदैव अमर रहेगी।




