छत्तीसगढ़

छत्तीसगढ़ में वन भैंसा संरक्षण एवं स्थानांतरण पर उच्च स्तरीय बैठक

(भूपेंद्र सिंह राठौर) : छत्तीसगढ़ में वन भैंसा संरक्षण और स्थानांतरण को लेकर नवा रायपुर स्थित आरण्य भवन में महत्वपूर्ण उच्च स्तरीय बैठक आयोजित की गई। बैठक की अध्यक्षता प्रधान मुख्य वन संरक्षक एवं मुख्य वन्यजीव वार्डन अरुण कुमार पाण्डेय ने की। बैठक में राज्य और राष्ट्रीय स्तर के कई वरिष्ठ वन अधिकारी और विशेषज्ञ मौजूद रहे।

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बैठक की शुरुआत वन भैंसा की वर्तमान स्थिति, संरक्षण और संख्या वृद्धि पर चर्चा से हुई।
बैठक में अपर प्रधान मुख्य वन संरक्षक (वन्य प्राणी) व्ही. माधेश्वरन, मुख्य वन संरक्षक एवं क्षेत्रीय निदेशक सुश्री सतीविशा समाजदार, वनमंडलाधिकारी धम्मशील गनवीर, उप संचालक संदीप बलगा सहित वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित थे। डॉ. आर.पी. मिश्रा (WTI) ने प्रेज़ेंटेशन के माध्यम से अब तक किए गए संरक्षण कार्यों और आगे की योजनाओं की जानकारी दी।
उन्होंने बताया कि वन भैंसा प्रदेश का तीसरा सबसे बड़ा वन्य जीव है और इसके संरक्षण के लिए वैज्ञानिक प्रयास अनिवार्य हैं। बैठक में बताया गया कि उदंती-सीतानदी टाइगर रिज़र्व और बारनवापारा अभयारण्य वन भैंसा संरक्षण के लिए अनुकूल हैं।

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वर्तमान में बारनवापारा में 1 नर और 5 मादा वन भैंसे मौजूद हैं। संरक्षण के वैज्ञानिक पहलुओं पर चर्चा में
डॉ. सम्राट मंडल (WII),डॉ. विवश पांडेव (WII),
डॉ. राहुल कौल (वाइल्ड बफैलो प्रोजेक्ट), डॉ. संदीप तिवारी (वाइल्डलाइफ़ कंज़र्वेशन), डॉ. कोमोलिका भट्टाचार्य (WTI) ने भी महत्वपूर्ण सुझाव दिए।
वन भैंसों की वास्तविक संख्या और शुद्ध नस्ल की पहचान के लिए जियो-मैपिंग तकनीक का उपयोग करने पर सहमति बनी।

बैठक में यह निर्णय लिया गया कि वन भैंसों के स्थानांतरण के लिए नेशनल बोर्ड ऑफ वाइल्डलाइफ और NTCA से अनुमतियाँ जल्द प्राप्त की जाएँगी। इसके लिए एक विशेष दल जल्द दिल्ली भेजा जाएगा।
स्वास्थ्य सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए वन भैंसों की देखभाल के लिए दो पशु चिकित्सकों की पूर्णकालिक तैनाती की जाएगी।

 

साथ ही सैटेलाइट आधारित निगरानी प्रणाली विकसित करने के लिए CZA से अनुमति लेने पर भी चर्चा हुई। इस दौरान डॉ. जी.के. दत्ता और डॉ. जसमीत सिंह (कामधेनु विश्वविद्यालय), जगदीश प्रसाद दरो, डॉ. पी.के. चंदन (कानन पेंडारी), डॉ. जय किशोर जड़िया (जंगल सफारी), और कृषानू चंद्राकर (बारनवापारा) भी शामिल रहे।

 

बैठक में काला हिरण के संरक्षण एवं पुनर्स्थापन कार्यक्रम की भी समीक्षा की गई। बताया गया कि वर्ष 2018 में शुरू हुए कार्यक्रम के बाद बारनवापारा में काला हिरणों की संख्या बढ़कर लगभग 190 तक पहुँच गई है।संरक्षण मॉडल को अन्य अभयारण्यों में लागू करने की तैयारी की जा रही है। राज्य के शीर्ष अधिकारियों और विशेषज्ञों की मौजूदगी में हुई यह महत्त्वपूर्ण बैठक वन भैंसा और काला हिरण जैसे दुर्लभ वन्यजीवों के संरक्षण में बड़ी भूमिका निभाएगी।
छत्तीसगढ़ सरकार की यह पहल जैव विविधता संरक्षण को एक नई दिशा देने वाली साबित हो सकती है।

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