बिलासपुर

DEIC बिलासपुर की लापरवाही उजागर, स्वास्थ्य सचिव ने कलेक्टर को दिए सुधार के सख्त निर्देश….

(जयेन्द्र गोले) : बिलासपुर – जिला अस्पताल के जिला शीघ्र हस्तक्षेप केंद्र यानी DEIC में गंभीर लापरवाही सामने आई है। विकासात्मक देरी वाले बच्चों के लिए बनाए गए इस महत्वपूर्ण केंद्र की प्रोग्रेस रिपोर्ट बेहद खराब हैं, अनुमानित वार्षिक प्रतिशत लगभग 30% दर्ज की गई है। यह स्थिति तब सामने आई है जब केंद्र में 13 स्टाफ मौजूद हैं और सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध कराए गए हैं।

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जानकारी के अनुसार DEIC का स्टाफ समय पर उपस्थित नहीं रहता, कई डॉक्टर और कर्मचारी देर से आते और जल्दी चले जाते हैं। डॉक्टर, थेरेपिस्ट, नर्सिंग स्टाफ, सोशल वर्कर और अन्य कर्मियों की मौजूदगी के बावजूद बच्चों तक सेवाएँ नहीं पहुँच पा रही हैं।

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DEIC का दायित्व है विकासात्मक देरी वाले बच्चों की पहचान करना, थेरेपी उपलब्ध कराना, उपचार देना और नियमित फॉलो-अप करना। लेकिन यहां न तो कैम्प आयोजित हो रहे हैं, न स्कूलों में स्क्रीनिंग हो रही है और न ही ग्रामीण क्षेत्रों में पहुंच अभियान। योजनाएं सिर्फ कागजों में चल रही हैं, जबकि ज़मीन पर बच्चों को कोई फायदा नहीं मिल रहा।सिविल सर्जन के अधीन कार्यरत स्टाफ जैसे अस्पताल सलाहकार कहने को तो nhm की प्रभारी है लेकिन नियंत्रण नही के बराबर है क्योंकि उनके खुद के आने का समय निर्धारित नही है। बॉयोमीट्रिक अटेंडेंस, आधार बेस अटेंडेंस को चेक किया जाए तो सच्चाई सामने आ जायेगी।

वर्तमान में केंद्र में तैनात स्टाफ – डॉ. मंजू करण, डॉ. यश अग्रवाल, डॉ. रमन जोगी, डॉ. ईश्वर प्रसाद, असवानी देवांगन (MLT), राहुल भारद्वाज (डेंटल असिस्टेंट), डॉ. अभिषेक बिबेय (DEIC मैनेजर), सीमा कश्यप, गामिनी मोहंती, दीपाली देवांगन (स्टाफ नर्स), शैली दीवान (सोशल वर्कर), आकांक्षा चौधरी और सुषमा साहू।

 

विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसी लापरवाही बच्चों के भविष्य पर गहरा असर डालती है। समय पर इलाज न मिले तो कई बच्चे उम्रभर विकासात्मक चुनौतियों से जूझते रहते हैं।

छत्तीसगढ़ शासन के लोक स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण तथा चिकित्सा शिक्षा विभाग के सचिव अमित कटारिया (IAS) ने बिलासपुर कलेक्टर को पत्र जारी कर DEIC की कार्यप्रणाली में सुधार के लिए तत्काल कदम उठाने के निर्देश दिए हैं।

 

पत्र में कहा गया – DEIC को पूर्ण रूप से क्रियाशील करना अनिवार्य है।

सभी आवश्यक मानव संसाधनों-फिजियोथेरेपिस्ट, स्पीच थैरेपिस्ट, साइकोलॉजिस्ट, ऑडियोलॉजिस्ट, ऑप्टोमेट्रिस्ट की उपलब्धता सुनिश्चित की जाए।

OPD संख्या बढ़ाने पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है।

उपकरणों की उपलब्धता बेहद कम है-31% उपकरण मौजूद और उनमें से केवल 26% ही क्रियाशील।

वर्ष 2024-25 में उपकरणों के लिए 11 लाख रुपए दिए गए थे, लेकिन उसका उपयोग प्रभावी नहीं हुआ।

DEIC स्टाफ की ड्यूटी अन्य जगह न लगाई जाए ताकि सेवाओं पर असर न पड़े।

नियमित समीक्षा कर केंद्र को 100% सक्रिय करना जरूरी है।

 

अब सवाल यह है—क्या जिला प्रशासन कड़ी कार्रवाई कर इस केंद्र को पटरी पर ला पाएगा, या फिर यह व्यवस्था कागजों में ही अटकी रहेगी? आने वाले दिनों में सभी की नजरें प्रशासन की कार्रवाई पर टिकी रहेंगी। अगले एपिसोड में इससे जुड़ी अन्य अहम जानकारियाँ और विभागीय कार्रवाई की विस्तृत अपडेट उपलब्ध कराई जाएगी।

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