अस्तित्व की लड़ाई जीतीं माया, सपना अब कुछ कर दिखाने का

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लोकस्वर मीडिया नेटवर्क
बिलासपुर। दिल में कुछ कर गुजरने की तमन्ना हो तो कोई भी बाधा रास्ते का रोड़ा नहीं बनते, लेकिन इंसान को अपना रास्ता स्वयं बनाना पड़ता है। अपनी जंग खुद ही लड़नी पड़ती है। इसका जीता-जागता उदाहरण ट्रांसजेंडर माया नारायण हैं। शुरू में मेल और फिमेल की दोहरी जिंदगी जीते हुए वो मानसिक तनाव झेल रही थीं। लेकिन रौशनी की एक किरण ने उन्हें अपने सपनों मे उड़ान भरने की ताकत दी। माया के पिता नहीं हैं। वो तीन भाई-बहनो में सबसे बड़ी हैं। दुनिया के डर से वो ट्रांसजेंडर की बातें छिपाती रहीं। लेकिन मन की मन उनमें हीन भावना घर कर गई थी। उन्होंने अपनी परेशानी का हल ढूंढ़ने का निश्चय किया। इसी बीच उन्हें उन्हीं की ही तरह कोई हमराज मिला। जिसने समाज कल्याण विभाग का रास्ता दिखाया और बताया कि इन बातों में शासन भी अब पूरा सर्पोट कर रही है। समाज कल्याण विभाग में उसे आईडेंटी कार्ड, राशन कार्ड सहित अन्य सुविधाएं मिलीं। उसके बाद ट्रांसजेंडर से फिमेल बनने की सर्जरी कराने लगातार वह रायपुर आना -जाना करती रहीं। उन्होंने बताया कि ये एक साल उसके लिए काफी संघर्षपूर्ण रहे। लेकिन उसने हार नहीं मानी। सफल ऑपरेशन के बाद वह अपने अस्तित्व को पाकर बहुत खुश है।

आईएएस बनने का लक्ष्य
सीयू से ग्रेजुएट व आईटीआई डिप्लोमा होल्डर माया का बचपन से ही केवल आईएएस अधिकारी बनने का सपना है। जिसके लिए वह रिस्तेदारी के माध्यम से दिल्ली भी गईं और स्टडी की तैयारी पर सुझाव और जानकारी ली। यही नहीं वो स्कूल-कॉलेज की हर एक्टिविटी में भी बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेती रहीं। वो एक अच्छी ब्यूटीशियन है।

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